Saturday, March 27, 2021

झूठ बोलो और खुलेआम बोलो

 बहुत साल बाद एक ऐसी सरकार आई है जो खुलेआम झूठ बोलती है और लोग यकीन भी करते हैं. दरसल लोगों ने, खासकर पिज्जा पीढ़ी ने पढ़ना- लिखना बंद कर दिया है. व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी और सोशल मीडिया पर उलजुलूल जानकारी पेश की जा रही लोग उसी को सच मान लेते हैं और उसी पर अपनी राय कायम कर ले रहे है. आज की पिज्जा पीढ़ी ना तो फैक्ट चेक करती है और ना ही किसी दावे को सच झूठ की कसौटी पर कसती है.

उदाहरण के तौर पर यूपी सरकार ने खुलेआम झूठ बोल दिया कि 12 हज़ार युवाओं को रोजगार दे दिया, सरकार ने बकायदा विज्ञापन भी जारी कर दिया. बहुत से लोग उसपर अपनी राय बना लिए की सरकार नौकरी दे रही है. जबकि हकीकत क्या है आप अपने आसपास के 4 युवाओं से पूछ लीजिये, नौकरी के लिए कितना भटक रहे. 

कहने का तात्पर्य ये है की जो भी पढ़िए, देखिये और सुनिए कम से कम उसे एक बार सत्यापित जरूर कीजिये.

कमलेश यादव  


Friday, May 2, 2014

अरसे बाद फिर तेरी याद आई

Tuesday, May 17, 2011

यूपी की लडाई..........

उत्तर प्रदेश में चुनाव अभी 2012 में होने है लेकिन राजनेताओं की तैयारियां जारी है। ताजा उदाहरण है जमीन के नाम पर होने वाली राजनीति। भट्टा पारसौल गांव में जो कुछ भी हुआ उसमें मारे गए आम लोग और आम लोग ही अब राजनीति में पीस भी रहे है। पुलिस और गांव वालो के बीच हुई झडप में जो पीएसी के जवान मारे गए वो भी किसी किसान परिवार से ही थे,और जो गांव वाले मारे गए वो भी किसान।।  यूपी की इस लडाई....में जमकर राजनीति उस समय शुरु हुई जब कांग्रेस के युवराज यानी राहुल गांधी वहां पहुच गए,तो बाकि नेताओ की आपत्ति ये थी कि उनको क्यों नही जाने दिया गया। अब राहुल ने इस लडाई को एक नया मोड दे दिया है...राहुल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात के बाद कहा कि गांव में पुलिस ने ज्यादतियां की और रेप के अलावा कई लोगों को पुलिस ने जिंदा जला दिया। अब राहुल की इस बात में कितनी सच्चाई है ये तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन सवाल ये उठता है कि हर एक एसा मशला जहां राहुल गांधी पहुचते है उसे ही सुर्खियां मिलती है। गरीबों की आवाज को बिना किसी सहारे के क्यों नहीं उठाया जाता? सच तो ये है कि चाहे मीडिया हो या नेता किसी को भी गरीबो की याद तब तक नहीं आती जब तक उनका अपना कोई हित ना हो। नेता वोट के लिए गरीबो का खून चूस रहे है तो मीडिया को बिना नेताओं के वहां पहुचें ख़बर ही नहीं दिखती। इन सब के बीच जो पीस रहा है वो है गरीब किसान। सरकार और प्रशासन को इस गुनाह का जबाब देना होगा नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब एक और खूनी क्रांति होगी।।

Monday, April 25, 2011

आदर्श को बनाए रखना बेवकूफी है या समझदारी ???

मेरा एक दोस्त है जो काफी दिनो बाद कल मुझे मिला।मुझे ये जानकर काफी खुशी हुई कि वो अब भी अपने सिद्धांतो पर कायम है,लेकिन बात यहां से शुरु होती है..इतिहास विषय में गोल्ड मेडलिस्ट होने के बाद भी वो अभी तक बेरोजगार है...उसके सिद्धांत उसे हर वो काम करने से रोकते है जो उसे लगता है कि उसे भ्रष्टाचारियों में शामिल कर देगा। चार साल आईएएस की तैयारी के बाद उसे सफलता नही मिली लेकिन आईएएस बनाने का दावा करने वाली कोचिंग संस्थाओ से उसे जो कडवा अनुभव मिला वो उसमें शामिल नही होना चाहता इसलिए उसने एक कोचिंग में पढाने के ऑफर ठुकरा दिया जो कि उसे मात्र 3 घंटे के 15 हजार रुपए दे रहा था। वो दिल्ली जैसे शहरो में ट्यूशन नहीं पढाना चाहता क्योकि उसे लगता है कि कुछ लोग तो पैसे देके अपने बच्चों को पढा लेते है लेकिन उन बच्चो का क्या जो की इतना पैसा नहीं दे सकते...और इसलिए आजकल वो अपने गांव में रहता है और बच्चो को पढाता है। ये कोई कहानी नही एक हकीकत है जो कि एक एसे युवा को गांव में रहने को मजबूर कर रहा जो कि गोल्ड मेडलिस्ट है। इस लडके के सिद्धांत इसे एक एसी जिंदगी दे रहे है जिसके लिए वो डिजर्व ही नही करता। उसकी जिंदगी में आगे क्या होगा,ये तो मुझे नहीं पता लेकिन उसे देख के एसा लगता है कि इस भ्रष्ट भारत में इमानदार बने रहना कितना मुश्किल है.....

Wednesday, December 29, 2010

आओ हम भी आंदोलन करें.......

देश में आए दिन कोई ना कोई आंदोलन होते ही रहते है...कभी आरक्षण के लिए,कभी किसी की रिहाई के लिए,कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ,तो कभी वोट के लिए विपक्षी दल..सत्तानशी सरकार के खिलाफ...इन आंदोलनों को देखकर मेरा भी मन हो रहा है कि कोई आंदोलन करु...एसे किसी आंदोलन की बुनियाद उठाए जिनमें मेरा कुछ स्वार्थ पूरा हो जाए....लेकिन आए दिन हो रहे इन तथाकथित आंदोलनो के पीछे की स्टोरी देखकर बहुत दुख होता है....बेशक आज हमारे देश में एक एसे आंदोलन की दरकार है...जो दिन ब दिन बढती मंहगाई और भ्रष्टाचारियों पर कुछ लगाम लगा सके,लेकिन एसा आंदोलन करे कौन ॥किसके पास इतनी फूरसत है...कि ऐसा इन तमाम लफडो में पड़े...जो अमीर है उन्हे कोई फर्क नहीं पड़ता चाहें कितनी भी मंहगाई बढ़ जाए और गरीब बिचारों के पास अपने और अपने परिवार का एक दिन का पेट भरने के लिए पूरा दिन निकल जाता है...कहां से आंदोलन करे...हां वैसे बेरोजगार जिन्हे किसी प्रदर्शन में जाने के 100रुपए मिल जाए...वो जरुर जाते है ,नारे लगाने..बेशक उसे ये पता होता है कि इन नारों से उसे सिर्फ एक दिन की मोहलत मिलनी वाली...उसके नाम पर कुछ लोग अखबारों में अपना फोटो लगाकर और टीवी पर दिखकर अपनी राजनीति रोटियां सेक लेगें और अपने राजनीतिक प्रोफाइल में एक और उपलब्धि जोड़ लेगें... लेकिन उसे तो कल फिर पेट की लडाई लडनी है..जिसके लिए वो फिर किसी प्रदर्शन में शामिल होगा...आजादी के पहले से हमारा देश गरीबी से लड रहे है...लेकिन आजतक गरीबी मंहगाई डायन बन कर गरीब की कमाई खाय जा रही है...तभी मेरे मन में ये खयाल आया कि हम भी एक आंदोलन करें.......

Wednesday, November 3, 2010

ओबामा देखेगें....दीपावली....या...

ये दिवाली दिलों का मेल कराती है....यहीं संदेश देने की कोशिश की जा रही है...ओबामा की भारत यात्रा के जरिए...लेकिन इस बीच एक विवाद की शुरुआत कर दी है...लखनऊ के शिया नेता सैयद कल्वे ने...कल्वे को ओबामा के मुसलमान मानने से भी एतराज है...लखनऊ में कल्वे ने ये एलान कर दिया की वो ओबामा की भारत यात्रा का विरोध करेगें...लेकिन सवाल ये है कि इस विरोध का मतलब क्या है...अगर वो ओबामा को मुसलमानों का दुश्मन मानते है औऱ ओबामा को आतंकवाद का जिम्मेदार मानते है तो क्या सभी भारतीय मुसलमान उनके इस बयान से सहमत है? अगर नही तो क्या कल्वे के इस बयान को महज पब्लिसीटि स्टंट मान लेना सही है? जबाब कई है लेकिन ओबमा की यात्रा को लेकर जिस तरह की तैयारियां की जा रही हैं और मीडिया जिस तरह से इसे महाखबर बनाने में लगा है...वो अपने आप में एक सवाल पैदा कर दिया है...दीवाली के मौके पर कितने गरीब घरों में दीप नहीं जल पाएगें॥कितनें घरों में पकौड़े तलने के लिए तेल उधार लिए जाएगें...किसी को इसकी चिंता है...क्या इंडिया साइनिंग का नारा लगाने वालों को इसका जरा भी ख्याल है....जरा सोचिए उन परिवारों के बारे में और दिवाली पर करोड़ो रुपए के पटाखे धुंआ में उड़ाने और पॉलुसन फैलाने के बजाय किसी एक परिवार के घर को रौशन करे...मेरे ख्याल से ये दिवाली दिल को ज्यादा सुकून देगी...इस कानफोडू पटाखों से......

Monday, September 6, 2010

बिहार चुनाव का ऐलान.............

लम्बे इंतजार के बाद आखिरकार बिहार विधानसभा चुनाव की तारिखों की घोषणा कर दी गई...नीतीश कुमार,लालू प्रसाद यादव औऱ रामविलास पासवान इनमें से एक भी नेता एसा नही जिसका दामन एकदम साफ हो...लालू की तुलना भ्रष्टाचार से करना ही, भ्रष्टाचार की तौहीन है...पासवान की राजनीतिक जमीन तो पहले से ही खिसक चुकी है...अब लालू के कंधे पर बैठकर बिहार की बैतरिणी पार करना चाहते है...और रही बात विकास पुरुष का दावा करने वाले नीतीश को तो...जाते-जाते वो भी अपने दामन में दाग लगावा बैठे...लेकिन बात दाग की नही है...बात तो अब शुरु होगी अब..जब जनता को वोट के नाम पर बांटा जाएगा...जनता को बाटने जाएगा जाति के नाम पर...पैसे से वोट खरीदे जाएगे औऱ बूथ लूटे जाएगें....लेकिन जनता करे तो क्या करें...एक ओर नक्सली और एक ओर सफेद कुर्ताधारी गुंडे जो कन्वर्ट होकर नेता बन गए है...बात अगर बिहार के पुराने नेताओं की करें तो कुछ गिने-चुनें ही साफ सुथरी छवि के दिख जांएगें ॥लेकिन उनकी तो बिहार में चलती नही...जब लालू जैसे नेता जो बिहार को रेलवे की ही तरह विकास की पटरी पर दौडानें की बात कर रहे है लेकिन वोट के लिए सहाबुद्दीन जैसे गुंडों से मिलने पहुंच जाते हैं...ऐसे लालू पर जनता भरोसा करे तो कैसे...पासवान को सिर्फ दिल्ली दिखती है और नीतीश भी अब दूध के धुले नही रहे...जनता सब जानती है॥बाढ से लेकर सुखे ने जनता को पहले ही तबाह कर रखा है...विकल्प में सारे चोर है ॥चुने तो चुने किसे...लेकिन इस बार तो शख्त कदम उठाने ही पडेगें अब कोई उपाय नहीं...इस बार अगर चुक गए तो एक बार फिर बिहार लूट जाएगा॥चोरों को पहचानों और ऐसे चोरों को चुनों जो इन सबमें इमानदार हो........

Monday, June 7, 2010

बेईमानो की दुनिया में बड़ा मुश्किल है इमानदार रहना

पिछले कई दिनों से इमानदारो की तरह जीने को मन करता हैसभी लोग ईमानदारी की जिन्दगी जीने की सलाह देते है मगर कोई इमानदार नही रह पातासच की बुनियाद पर जिन्दगी खड़ा करने के लिए मैंने अपने घर में सच का एक खेल खेला जिसकी सजा मुझे यु मिली की हम अपने ही घर वालो से दूर हो गयेअब जो बच्चे है भी हमें सिखाने की कोशिश करते जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया होलेकिन मैंने सिर्फ अपनी जिन्दगी ईमानदारी से जीने के लिए एक सच बोला थाअगर मैंने झूठ बोला होता तो आज सब खुश होतेतो क्या गुनाह कर दिया मैंने क्या अपने जाति से बाहर और खुद की मर्जी से शादी करना इतना बड़ा गुनाह है की जो हमें इतने अरमानो से पाले , पढाया -लिखाया आज ही मुझे पराया बना दिए हैमाँ तो मान भी जाती है पर क्या पिता इतने कठोर हो सकते है जो अपने बेटे से ४महिनो तक बात ही नही करतेसोचा था इन जज्बातों को अपने सीने में ही दफना दूंगा लेकिन आज मान बड़ा बोझिल हैकई दिनों से ये बाते मुझे सालती रहती हैमुझे पता है किसी को मेरी ये बाते बहुत बुरी लगेगी क्योकि नहीं चाहती की हमारे घर की बाते लोगो तक पहुचे लेकिन मै चाहता हु की मेरी बातें ,मेरे मन के भीतर चल रहे द्वन्द को भी समझे हलाकि मुझे पता ही की सब जानती हैफिर भी मै ये साबित कर दूंगा मै सही हुकोई भी माँ बाप अपने बेटे या बेटी की ख़ुशी में ही खुश होता हैलेकिन दुसरे लोग जो खुद के बेटे बेटी की चिंता कर दुसरो की दुनिया में दखल देने की नाकाम कोशिश करते रहते हैमेरा ये कहानी सुनाने का मकसद सहनुभूति लेना नही है ,और ना ही मुझे सहानुभूति की जरुरत हैमै बस लोगो को ये बताना चाहता हु की आखिर कब तक आप दुसरो के लिए अपने बच्चो से नाराज रहेगे ? मेरा मकसद है उन माँ बाप को ये बताना की आप दुसरो की ख़ुशी के लिए अपने बच्चो की ख़ुशी छीन लेते हैआपके बच्चे आपसे दूर रहकर खुश नही रहते और ना आप ही खुश रह पाते है लेकिन आप क्यों दुनिया की खातिर आपनो से दूर है ?...............

Saturday, March 13, 2010

महिला आरक्षण या महिला का अपमान

महिला आरक्षण के मुद्दे पे यादवो ने जो एकता दिखने की कोशिश की है या दिखा रहे है अगर यही एकता यादवो के बिकास के लिए दिखाते तो सायद यादवो का कुछ भला हो हो जाता। लालू ,मुलायम और शरद को शायद ये नही पता की यादव अब उनकी बातों में नही आने वाले है। यादवो के नाम पर अब तक राजनितिक रोटिया सेकने वाले ये नेता अभी भी अनपढ़ यादवो को बेवकूफ बना रहे है । सिर्फ अपने परिवार की चिंता करने वाले ये यादव नेता बाकि कितने यादवो को राजनीति में आगे लाये है ? इन्हें तो सिर्फ अपने परिवार की चिंता है और अब जब इन्हें अपनी लुटिया डूबती नजर आ रही है तो ये महिलाओ के नाम पर राजनितिक रोटिया सेकना चाहते है । लेकिन मेरे प्यारे यादव भाइयो अब जनता होसियार हो गई है । जातिवाद और धर्म की राजनीति से ऊपर आ जाओ और देश में गरीबो के लिए कुछ आवाज उठा लो । महिला बिल पे हल्ला मचाने वाले लालू भैया उस समय कहा था आपका विरोध जब राबरी जी को मुख्यमंत्री बना दिए थे । कोटे के अन्दर कोटे को लाकर अभी और कितने बटवारे करने का मूड है आपका । और नेताजी आपको तो खुश होना चाहिए आपकी बहु डिम्पल आरक्षण मिलते ही सांसद बन जाएगी कम से कम उन्हें हराने वाला कोई पुरुष नेता तो नही होगा । क्या कर रहे हो यादव भाइयो महिला का अपमान या इज्जत ?

Saturday, November 14, 2009

देवो की भूमि बनी फ्राडों की भूमि

देरादून आज कल फ्रोडगिरी का अड्डा बन गया है । पिछले एक माह से रोज अख़बार में यैसे ही चर्चे दीखते है । देहरादून में नई-नई प्लेसमेंट एजेन्सीया और इंसोरेंस के नाम पर हजारो लोगो को ठगा जा चुका है पर पुलिस एक भी फ्रोड को पकड़ नही सकी है । और तो और हद तो तब हो गई जब पुलिस का एक जवान ही गायब हो गया, बाद में भाई साहब चोरी की कार बेचते हुए पकड़े गए .येसी है अपने आप को मित्र पुलिस कहने वाली देहरादून पुलिस । ख़ुद को विजय आनन्द शर्मा बताने वाला एक ब्यक्ति निति नाम की एक लड़की के साथ मिलकर मंगलाचरणम नाम की एक कंपनी खोला और इन्सुरेंस ने नाम पर बिडला इंसोरेंस कम्पनी के इसुरेंस कराया और पैसे इक्कठे करके चंपत हो गया । हजारो लोगों को बेवकूफ बनाकर जाने वाले इस आनंद को पुलिस आजतक नही पकड़ सकी । यैसे ही कारनामे रोज सामने आ रहे है ...और पुलिस हाथ पे हाथ धरे बैठी है ..

Monday, October 26, 2009

वाह रे ..डाक्टर ....

भगवान का दूसरा रूप माने जाने वाले डॉक्टर बेशक लोगो की जान बचाते है ...पर कुछ झोला छाप तथाकथित डॉक्टर भगवान के रूप माने जाने वाले डॉक्टरो को बदनाम कर रहे है ....और लोग मजबूरी में इनके पास जाते है । गावों की हालत तो छोडिए देश की राजधानी में हालत ख़राब है । मै आजकल देहरादून में जॉब कर रहा हूँ ..दिवाली की छुट्टी के लिए अपने घर देवरिया जाने के लिए मैंने बस लिया ..ट्रैफिक के कारण मुझे २४ घंटे लगे बस में जहाँ मच्छरों ने जम कर मेरा स्वागत किया और दिवाली के रात मुझे कपकपी के साथ बुखार आया । अगली सुबह गावं के एक डॉक्टर से दवा लिया उसने मुझे मलेरिया की दवा दी । फ़िर भी बुखार नही गया तो मै दुसरे डॉक्टर के पास गया उसने सारा जाँच कराने के बाद कहा की वायरल है फ़िर भी मुझे आराम नही हुआ और दिन पर दिन मेरी हालत ख़राब होती गई ..परेशान होकर मै किसी तरह दिल्ली पंहुचा । दिल्ली के हरिनगर आश्रम में एक अस्पताल में गया वह डॉ अंसारी ने मुझे पीलिया बताया और हजार रूपये येठे फ़िर भी कुछ आराम नही हुआ और मेरी हालत चिंताजनक हो गई। फ़िर मै अशोक विहार में नार्थ डेल्ही नर्सिंग होम में गया जहा पता चला की मुझे डेंगू है और ५ दिन अस्पताल में भर्ती रहा तब जाके पुरी तरह ठीक हुआ और जान बची ...अब सवाल ये है की मै किस किस पे केस करू ॥ मै एक पत्रकार हु जब मेरे साथ येसा हुआ तो आम लोग की तो आप कूद सोच ले क्या हाल..सरकारी अस्पताल में कोई डॉक्टर नही मिलता लोग जाए तो जाए कहा जाए ..अब सवाल ये है की मेरी जिन्दगी से जो मजाक किया गया और मुझे १५ हजार रूपये खर्च करने पड़े उसके लिए कौन जम्मेदार है ...एक भी गुनाहगार को मै छोड़ने वाला नही..

देहरादून से गोरखपुर बस से जाते समय

यह तो एक नमूना है ... जाने कितने बच्चे सड़क पर दो जून की रोटी के लिए झाडू लगाते मिल जायेगे ...शर्म आनी चाहिए उन एन जी के नाम पर अपना धंधा चलने वालो को और शर्म आनी चाहिए यु पी सरकार को जो मूर्ति के नाम पर पैसे बर्बाद कर रही है .. बच्चे दलित थे ..जो मुसाफिरों के गंदगी को साफ कर रहे थे ...और अब कर रहे होगे ...

Tuesday, August 18, 2009

इतना भी मत डर यार

आज कल स्वाइन फ्लू का डर हर तरफ़ देखा जा रहा है ..लोग इतना डरे हुए है की अगर कोई छींक भी देता है तो लोग मुह ढकने लगते है । मेरे आफिस में एक लड़की को जुखाम हो गया उसने मास्क लगा लिया । अगले दिन जब वह आफिस आई तो लोग उससे ऐसी दुरी बना रहे थे जैसे सबको फ्लू ही हो जाएगा । सावधानी जरुरी है पर क्या इतना ज्यादा डरने की भी जरुरत है । इस बीच बाबा रामदेव भी अपना योग और आयुर्वेद लेकर मीडिया के सामने आ गए अब पता नही बाबा अभी तक कहा थे जो इतनी जिन्दगियो के जाने के बाद सामने आए और पता नही उनके बताये उपायों से कोई मरीज ठीक भी हुआ नही ..जल्द ही बाबा का अपना चैनल आने वाला है लोग देखेगे और शायद अब सब ठीक रहेगे..वाह बाबा ..वाह ..

Wednesday, July 15, 2009

किसानो की हालत और कृषि

बजट आने के बाद उस पर चर्चा के दौरान लोकसभा में कृषि को ४ प्रतिशत की विकास दर लेन का दावा किया जा रहा है । लालू जी ने इस मुद्दे को बड़ी गंभीरता से प्रणब जी को समझाया । किंतु सभी उपरी और सुनी सुनाई बातो पर चर्चा करते रहे कोई भी मामले की तह तक नही पहुच पाया । इससे पता चलता है की आज हमारे नेता कितना जुड़े है आम लोगो से ।
गाव की वास्तविकता को और समझ के लिए इन नेताओ को गावों में जाने की जरुरत है । सरकार तरह तरह की योजनाये तो बना देती है किंतु इन योजनाओ का क्या हाल है उसे देखने वाला कोई नही है । जिनके भरोसे ये योजनाये चल रही है वो सिर्फ़ अपना फायदा कमाना चाहते है, और जो समितिया बने उन्होंने ने भी लीपापोती करके रिपोर्ट जमा कर दिया ।
भारत में आज भी खेती का कम अशिक्षित लोग ही करते है ,पढ़े-लिखे लोग अगर खेती करे तो गाव में उसे तौहीन माना जाता है लोग उसे पढ़ा लिखा बेवकूफ मानते है जिसका कारण है कि अधिकतर किसानो को यह पता ही नही होता कि किस समय किस तरह कि फसल और कौन सी खाद डालनी चाहिए ।
गावों में संचार के साधनों उपयोग कम ही होता है । रेडियो को छोड़कर अख़बार और टीवी कम ही लोग देखते है ।

Monday, June 29, 2009

राहुल का कांग्रेसवाद

कांग्रेस की सीटे यूपी में बढ़ी और राहुल की जय जयकार होने लगी अब सरकार में भी राहुल का बोलबाला है किंतु माया से कोई भी खुल के लड़ने को तैयार नही है। गरीबो के नाम पर इतना पैसा केन्द्र सरकार दे रही है और दलितों की बेटी कहलाने वाली माया के ही राज में दलितों की बदतर हालत है। पिछले दिनों लखनऊ गए थे मुझे लगा जयपुर में हु। माया को ख़ुद को इतिहास में नाम दर्ज करना ही है तो जिस राजनीतिक मिशन को लेकर वह चली थी उसी के बल बूते ही उन्हें याद किया जाता किंतु अब धीरे धीरे दलितों की ही दुश्मन बनती जा रही है ।गाव के कुछ दलितों से मैंने बात किया वे बताते है माया से अच्छी तो सोनिया है जो गाव में ही काम दिला रही है। हालाकि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना में खामिया भी है और मजदूरो ने भी बताया की जॉब कार्ड के लिए उन्होंने ५०० रूपये दिए किंतु अब उन्हें कम मिल रहा है और उन्हें बाहर नही जाना पड़ता है । यही कारण है की इसबार यूपी में कांग्रेस की सीटे बढ़ी है । अब भी माया को समझ नही आ रहा है ......

Saturday, May 16, 2009

नही चला हिंदुत्वाद ,अब भी वक्त है सम्हाल जाओ...

लोकसभा के नतीजो ने सबको तो हैरत में डाला ही,सबसे ज्यादा हैरत में डाला बीजेपी को । बीजेपी को आम जनता ने एक सबक जरुर सिखा दिया की अब हिन्दुत्व का मुद्दा पुराना हो गया है । अब शायद कुछ सबक ले अब बीजेपी। सबसे ज्यादा चौकाया यूपी ने ,बसपा और सपा को जनता ने चेताया ही नही सज़ा भी दिया । अब मायावती को शायद कुछ सदबुधि मिलेऔर वह समझ जाए की जाति की राजनीति बहुत हो चुकी अब जनता समझदार हो चुकी है ।अब जाति के नाम पर नही काम के आधार पर vote मिलते है।nitish इस bat के pratyachh udaharad है। इस chunaw ने एक bat तो तय कर दिया की अब bhartiya जनता समझदार हो गई है और यह bhartiya लोकतंत्र के लिए खुशी की bat है। Paswan , lalu ,Mulayam और Maya जिसने भी जाति की राजनीति में जाति का sahara लिया सबको जनता ने बता दिया की अब सिर्फ़ जाति से नही काम चलेगा काम karana पड़ेगा। maya को अब dalito के लिए सिर्फ़ मूर्ति नही काम चाहिए । आख़िर rahul का karnama चला अब देखना होगा इनकी इस mehnat का क्या inam देती है सोनिया जी ।

Wednesday, May 6, 2009

मुलजिम जीवनराम के बहाने...

कमलेश यादव


आजकल टीवी पर एक विज्ञापन आता है प्लाइवुड का , जिसमे प्लाइवुड की मजबूती को दिखाया जाता है की इतने वर्षो तक वह वैसी की वैसी ही है जितना खरीदने के वक्त थी।इस विज्ञापन को अदालत में एक मुकदमे के बहाने दिखाया जाता है अपराधी और वकील दोनों बूढे हो जाते है किंतु फ़ैसला नही हो पता और मुकदमा चलता ही रहता है। यही सच्चाई हमारे न्याय व्यवस्था का भी है जहा मुकदमे सालो साल चलते ही रहते है । हमारी अदालतों में ५० लाख से भी ज्यादा मुकदमे लंबित पड़े है । यहाँ तक की आतंकवाद और हत्या जैसे गंभीर मामलों के अपराधी जिनको सजा भी मिल चुका है ,उसका भी क्रियान्यवयन नही हो पा रहा है। मुकदमे चलते ही रहते है और आरोपी को जब तक सजा हो पाए उससे पहले ही आरोपी अपनी जीवन-यात्रा पुरी कर चुका होता है। अदालतों में लंबे जीवन काल तक चलते इन मुकदमो का नुकसान तो है ही किंतु कुछ फायदे भी है ,समझदार लोग जो अदालतों की सच्चाई को जानते है वे किसी विवाद में पड़ते भी है तो अदालत तक नही जाते ,कुछ ले दे के वही विवाद को निपटा लेते है और एसे विवादों को निपटने में पुलिस वालो और छुटभैये को विशेष योगदान रहता है। जिससे हमारे जज महोदयो का बोझ थोड़ा कम हो जाता है ,और जो अपराधी होते है वे आराम से अपराध करते है क्योकि वे जानते है की पहले तो कोई उनके खिलाफ अदालत और पुलिस के पास जाएगा नही और अगर गया भी तो केस दर्ज नही होगा और यदि केस दर्ज भी हो गया तो कितनी तारीख तक अदालत जाएगा । अदालत में मुकदमा तो चलता ही रहेगा हमारा काम बाधित नही हो सकता है ,जैसे एक केस के लिए अदालत जाते है वैसे दो-चार और केस होगी तो भी देख लेगे और वह आराम से अपराध पे अपराध करता ही जाता है ...करता ही जाता है । इसका सबूत भी है हमारे पास हमारे नेता जिनपर कई -कई मुकदमे चल रहे है और वे आराम से नेतागिरी कर रहे है । अपराधियों की बदती हुई संख्या भी न्याय प्रक्रिया में धीमापन का ही परिणाम है । अपराधी अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर न्याय व्यवस्था को प्रभावित करते है । करोडो के घोटले करके नेता और अफसर आराम से चुनाव लड़ते है और जनता पर शासन कर रहे है ।

Friday, April 24, 2009

कौन सूध लेता है आजकल गांववालों की ???

दूसरे चरण के मतदान और नक्सल हिंसा के बीच यूपी के देवरिया जिले के गांव डुमरी का एक टोला हतवा आग लगने से पूरी तरह जल कर राख हो गया । अखबारों और चैनलों के साथ-साथ प्रशासन को भी उस गांव की ख़बर लेने की जरुरत नही महसूस नही हुई क्योकि वहा चुनाव हो चुका है । अब किसे उनकी जरुरत है । किसान की पूरी कमाई उसकी खेती और उसका अनाज होता है जिससे पूरे साल उसका जीवन यापन होता है किंतु गांव के किसानो का सारा अनाज आग की भेट चढ़ गया । गर्मी और तेज हवाओ ने कुछ भी नही छोड़ा उन गरीबो के लिए । अनाज, कपड़े और थोड़े बहुत गहने जो ग्रामीण महिलायों की जान होते है, सब कुछ राख में तब्दील हो गया । गांव वालो द्वारा बार- बार पुलिस और फायर ब्रिगेड को फोन करने के पश्चात् भी वे घटना स्थल पर तब पहुचे जब पुरा गांव जल कर राख हो चुका था । मुद्दे की बात करने वाला चैनल जिसे मैंने चार बार फोन किया उसके लिए ५० घरो की बर्बादी, कोई मुद्दा नही बना ।

हमारे देश में सत्यम जैसे घोटाले होने के बाद सहायता के पॅकेज देने में कोई देरी नही की जाती जिसके जिम्मेदार सत्यम जैसी संस्थाओ के लोग ख़ुद होते है। किंतु एक तरफ़ किसान भूखे मरने की राह पर होते है तो भी सरकार सहायता पॅकेज देने तब पहुचती है जब किसान मरने लगते है । दिल्ली जैसे महानगरो में यदि एक शार्ट सर्किट भी हो जाता है तो मीडिया ख़ास कर चैनल इसे ब्रेकिंग न्यूज बना देते है और वही दूसरी तरफ देवरिया जैसी घटनाये जिसमे ना जाने कितने परिवार बर्बाद हो जाते है तो भी इनके लिए कोई न्यूज़ नही बनती , बताने के बाद भी ...सिर्फ़ ग्लैमर और अपराध की घटनाओ को बढ़ा चढ़ा के पेश करना आजकल चैनलों की नियत बन गई है । क्या यही सच्ची पत्रकारिता है जो इतनी बड़ी बर्बादी को अनदेखी कर रही है ?

Tuesday, April 21, 2009

पप्पू वोट क्यो नही देता ?

पिछले कुछ वर्षो में पप्पू एक फेवरेट स्लोगन हो गया है । बात चाहे परीक्षा की हो या वोट की पप्पू का नाम जरुर लिया जाता है । आज सिर्फ़ पप्पू का ही नही बल्कि हर वर्ग के लोगो का रुझान वोट डालने और राजनीति के प्रति घटता जा रहा है जो एक चिंताजनक बात है । इसके लिए हर कोई चिंतित नजर आ रहा है चाहे ओ राजनीतिक दल हो या चुनाव आयोग । भारत में जहा चुनाव एक महामेला और महापर्व माना जाता है ,वह ऐसी कौन सी स्थिति आ गई की लोग चुनाव और नेताओ के नाम से भी चिढने लगे है । दरअसल हमारे भारतीय मनमानस में अभी भी गाँधी, जवाहर, बोस जैसे नेताओ का प्रभाव कही न कही बसा हुआ है और हम आज के नेताओ की तुलना उसी पुरानी कसौटी पर करते है जिस पर हमारे वर्तमान नेता कही नही ठहरते है । पिछले कुछ वर्षो में राजनीति में अपराधियो की लगातार बढ रही जमात भी युवा मनो को खिन्न किया है । एक महत्वपूर्ण बात यह है की आज का युवा भी कही न कही सामाजिक तथा राजनीतिक चुनौतियों को स्वीकार करने से पीछे हटने लगे है ।आज का युवा आत्मकेंद्रित हो गया है । उसे लगता है कोई आएगा और सब कुछ बदल जाएगा या जो कुछ चल रहा है चलने दो हमें क्या फर्क पड़ता है । आज का युवा अपने कैरियर को अधिक प्राथिमिकता देता है न की देश की समस्याओ पर । युवा वर्ग ख़ुद आगे bad कर चुनौती नही स्वीकार करना चाहता और यदि वह आगे आना भी चाहता है तो राजनीतिक पार्टिया टिकट देने में इतनी देर कर देती है की युवा निराश हो कर राजनीति छोड़ देता है या टिकट की आस में बुड्डा हो जाता जो । राजनीति में बढता वंशवाद भी युवाओ को राजनीति से मुह मोड़ने में योगदान कर रहा है । जयप्रकाश नारायण ,लोहिया या अन्य युवा नेता जो राजनीति में आए ,उन्होंने ख़ुद आगे बढ कर नेतृत्व अपने हाथो में लिया और देश की राजनीति में क्रन्तिकारी बदलाव लाये । आज युवाओ में उसी दृढ़ इच्छाशक्ति की जरुरत है । परिवर्तन समस्या से लड़ने और जूझने से होगा न की मुह मोड़ने से । पिछले दिनों जैसे संसद में हुए वोट के बदले नोट जैसी घटनाये संसद की कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण होने के कारन मतदाताओ को सीधे देखने को मिली और जब मतदाता अपने चुने गए नेतो को संसद में कुर्सिया तोड़ते और लड़ते हुए देखते है तो उन्हें राजनीति से निराशा होती है । नेतो और अधिकारियो के गठजोड़ के कारन बड़ते भ्रष्टाचार और आए दी टीवी और अखबार में आते इनके स्कैंडल यहाँ तक की संसद में प्रश्न पूछे जाने तक के लिए पैसे लेते नेता आम मतदाता को नीरस कर रहे है । आशा है इस बार पप्पू इन नेताओ को सबक जरुर सिखायेंगे और वोट देने जरुर जायेगे ।