Friday, May 2, 2014

अरसे बाद फिर तेरी याद आई

Tuesday, May 17, 2011

यूपी की लडाई..........

उत्तर प्रदेश में चुनाव अभी 2012 में होने है लेकिन राजनेताओं की तैयारियां जारी है। ताजा उदाहरण है जमीन के नाम पर होने वाली राजनीति। भट्टा पारसौल गांव में जो कुछ भी हुआ उसमें मारे गए आम लोग और आम लोग ही अब राजनीति में पीस भी रहे है। पुलिस और गांव वालो के बीच हुई झडप में जो पीएसी के जवान मारे गए वो भी किसी किसान परिवार से ही थे,और जो गांव वाले मारे गए वो भी किसान।।  यूपी की इस लडाई....में जमकर राजनीति उस समय शुरु हुई जब कांग्रेस के युवराज यानी राहुल गांधी वहां पहुच गए,तो बाकि नेताओ की आपत्ति ये थी कि उनको क्यों नही जाने दिया गया। अब राहुल ने इस लडाई को एक नया मोड दे दिया है...राहुल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात के बाद कहा कि गांव में पुलिस ने ज्यादतियां की और रेप के अलावा कई लोगों को पुलिस ने जिंदा जला दिया। अब राहुल की इस बात में कितनी सच्चाई है ये तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन सवाल ये उठता है कि हर एक एसा मशला जहां राहुल गांधी पहुचते है उसे ही सुर्खियां मिलती है। गरीबों की आवाज को बिना किसी सहारे के क्यों नहीं उठाया जाता? सच तो ये है कि चाहे मीडिया हो या नेता किसी को भी गरीबो की याद तब तक नहीं आती जब तक उनका अपना कोई हित ना हो। नेता वोट के लिए गरीबो का खून चूस रहे है तो मीडिया को बिना नेताओं के वहां पहुचें ख़बर ही नहीं दिखती। इन सब के बीच जो पीस रहा है वो है गरीब किसान। सरकार और प्रशासन को इस गुनाह का जबाब देना होगा नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब एक और खूनी क्रांति होगी।।

Monday, April 25, 2011

आदर्श को बनाए रखना बेवकूफी है या समझदारी ???

मेरा एक दोस्त है जो काफी दिनो बाद कल मुझे मिला।मुझे ये जानकर काफी खुशी हुई कि वो अब भी अपने सिद्धांतो पर कायम है,लेकिन बात यहां से शुरु होती है..इतिहास विषय में गोल्ड मेडलिस्ट होने के बाद भी वो अभी तक बेरोजगार है...उसके सिद्धांत उसे हर वो काम करने से रोकते है जो उसे लगता है कि उसे भ्रष्टाचारियों में शामिल कर देगा। चार साल आईएएस की तैयारी के बाद उसे सफलता नही मिली लेकिन आईएएस बनाने का दावा करने वाली कोचिंग संस्थाओ से उसे जो कडवा अनुभव मिला वो उसमें शामिल नही होना चाहता इसलिए उसने एक कोचिंग में पढाने के ऑफर ठुकरा दिया जो कि उसे मात्र 3 घंटे के 15 हजार रुपए दे रहा था। वो दिल्ली जैसे शहरो में ट्यूशन नहीं पढाना चाहता क्योकि उसे लगता है कि कुछ लोग तो पैसे देके अपने बच्चों को पढा लेते है लेकिन उन बच्चो का क्या जो की इतना पैसा नहीं दे सकते...और इसलिए आजकल वो अपने गांव में रहता है और बच्चो को पढाता है। ये कोई कहानी नही एक हकीकत है जो कि एक एसे युवा को गांव में रहने को मजबूर कर रहा जो कि गोल्ड मेडलिस्ट है। इस लडके के सिद्धांत इसे एक एसी जिंदगी दे रहे है जिसके लिए वो डिजर्व ही नही करता। उसकी जिंदगी में आगे क्या होगा,ये तो मुझे नहीं पता लेकिन उसे देख के एसा लगता है कि इस भ्रष्ट भारत में इमानदार बने रहना कितना मुश्किल है.....

Wednesday, December 29, 2010

आओ हम भी आंदोलन करें.......

देश में आए दिन कोई ना कोई आंदोलन होते ही रहते है...कभी आरक्षण के लिए,कभी किसी की रिहाई के लिए,कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ,तो कभी वोट के लिए विपक्षी दल..सत्तानशी सरकार के खिलाफ...इन आंदोलनों को देखकर मेरा भी मन हो रहा है कि कोई आंदोलन करु...एसे किसी आंदोलन की बुनियाद उठाए जिनमें मेरा कुछ स्वार्थ पूरा हो जाए....लेकिन आए दिन हो रहे इन तथाकथित आंदोलनो के पीछे की स्टोरी देखकर बहुत दुख होता है....बेशक आज हमारे देश में एक एसे आंदोलन की दरकार है...जो दिन ब दिन बढती मंहगाई और भ्रष्टाचारियों पर कुछ लगाम लगा सके,लेकिन एसा आंदोलन करे कौन ॥किसके पास इतनी फूरसत है...कि ऐसा इन तमाम लफडो में पड़े...जो अमीर है उन्हे कोई फर्क नहीं पड़ता चाहें कितनी भी मंहगाई बढ़ जाए और गरीब बिचारों के पास अपने और अपने परिवार का एक दिन का पेट भरने के लिए पूरा दिन निकल जाता है...कहां से आंदोलन करे...हां वैसे बेरोजगार जिन्हे किसी प्रदर्शन में जाने के 100रुपए मिल जाए...वो जरुर जाते है ,नारे लगाने..बेशक उसे ये पता होता है कि इन नारों से उसे सिर्फ एक दिन की मोहलत मिलनी वाली...उसके नाम पर कुछ लोग अखबारों में अपना फोटो लगाकर और टीवी पर दिखकर अपनी राजनीति रोटियां सेक लेगें और अपने राजनीतिक प्रोफाइल में एक और उपलब्धि जोड़ लेगें... लेकिन उसे तो कल फिर पेट की लडाई लडनी है..जिसके लिए वो फिर किसी प्रदर्शन में शामिल होगा...आजादी के पहले से हमारा देश गरीबी से लड रहे है...लेकिन आजतक गरीबी मंहगाई डायन बन कर गरीब की कमाई खाय जा रही है...तभी मेरे मन में ये खयाल आया कि हम भी एक आंदोलन करें.......

Wednesday, November 3, 2010

ओबामा देखेगें....दीपावली....या...

ये दिवाली दिलों का मेल कराती है....यहीं संदेश देने की कोशिश की जा रही है...ओबामा की भारत यात्रा के जरिए...लेकिन इस बीच एक विवाद की शुरुआत कर दी है...लखनऊ के शिया नेता सैयद कल्वे ने...कल्वे को ओबामा के मुसलमान मानने से भी एतराज है...लखनऊ में कल्वे ने ये एलान कर दिया की वो ओबामा की भारत यात्रा का विरोध करेगें...लेकिन सवाल ये है कि इस विरोध का मतलब क्या है...अगर वो ओबामा को मुसलमानों का दुश्मन मानते है औऱ ओबामा को आतंकवाद का जिम्मेदार मानते है तो क्या सभी भारतीय मुसलमान उनके इस बयान से सहमत है? अगर नही तो क्या कल्वे के इस बयान को महज पब्लिसीटि स्टंट मान लेना सही है? जबाब कई है लेकिन ओबमा की यात्रा को लेकर जिस तरह की तैयारियां की जा रही हैं और मीडिया जिस तरह से इसे महाखबर बनाने में लगा है...वो अपने आप में एक सवाल पैदा कर दिया है...दीवाली के मौके पर कितने गरीब घरों में दीप नहीं जल पाएगें॥कितनें घरों में पकौड़े तलने के लिए तेल उधार लिए जाएगें...किसी को इसकी चिंता है...क्या इंडिया साइनिंग का नारा लगाने वालों को इसका जरा भी ख्याल है....जरा सोचिए उन परिवारों के बारे में और दिवाली पर करोड़ो रुपए के पटाखे धुंआ में उड़ाने और पॉलुसन फैलाने के बजाय किसी एक परिवार के घर को रौशन करे...मेरे ख्याल से ये दिवाली दिल को ज्यादा सुकून देगी...इस कानफोडू पटाखों से......

Monday, September 6, 2010

बिहार चुनाव का ऐलान.............

लम्बे इंतजार के बाद आखिरकार बिहार विधानसभा चुनाव की तारिखों की घोषणा कर दी गई...नीतीश कुमार,लालू प्रसाद यादव औऱ रामविलास पासवान इनमें से एक भी नेता एसा नही जिसका दामन एकदम साफ हो...लालू की तुलना भ्रष्टाचार से करना ही, भ्रष्टाचार की तौहीन है...पासवान की राजनीतिक जमीन तो पहले से ही खिसक चुकी है...अब लालू के कंधे पर बैठकर बिहार की बैतरिणी पार करना चाहते है...और रही बात विकास पुरुष का दावा करने वाले नीतीश को तो...जाते-जाते वो भी अपने दामन में दाग लगावा बैठे...लेकिन बात दाग की नही है...बात तो अब शुरु होगी अब..जब जनता को वोट के नाम पर बांटा जाएगा...जनता को बाटने जाएगा जाति के नाम पर...पैसे से वोट खरीदे जाएगे औऱ बूथ लूटे जाएगें....लेकिन जनता करे तो क्या करें...एक ओर नक्सली और एक ओर सफेद कुर्ताधारी गुंडे जो कन्वर्ट होकर नेता बन गए है...बात अगर बिहार के पुराने नेताओं की करें तो कुछ गिने-चुनें ही साफ सुथरी छवि के दिख जांएगें ॥लेकिन उनकी तो बिहार में चलती नही...जब लालू जैसे नेता जो बिहार को रेलवे की ही तरह विकास की पटरी पर दौडानें की बात कर रहे है लेकिन वोट के लिए सहाबुद्दीन जैसे गुंडों से मिलने पहुंच जाते हैं...ऐसे लालू पर जनता भरोसा करे तो कैसे...पासवान को सिर्फ दिल्ली दिखती है और नीतीश भी अब दूध के धुले नही रहे...जनता सब जानती है॥बाढ से लेकर सुखे ने जनता को पहले ही तबाह कर रखा है...विकल्प में सारे चोर है ॥चुने तो चुने किसे...लेकिन इस बार तो शख्त कदम उठाने ही पडेगें अब कोई उपाय नहीं...इस बार अगर चुक गए तो एक बार फिर बिहार लूट जाएगा॥चोरों को पहचानों और ऐसे चोरों को चुनों जो इन सबमें इमानदार हो........